Dr. S. S. Pandey

समान नागरिक संहिता (UCC) : समानता, बहुलता और भारत की संवैधानिक यात्रा

समान नागरिक संहिता (UCC) : समानता, बहुलता और भारत की संवैधानिक यात्रा

समान नागरिक संहिता (UCC) : समानता, बहुलता और भारत की संवैधानिक यात्रा

“मैं किसी भी ऐसी रूढ़ि या कानून का समर्थन नहीं कर सकता जो इंसान को इंसान से कमतर समझे। विविधता का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है।”
— महात्मा गांधी
(यंग इंडिया)

“विविधता हमारी पहचान है और होनी चाहिए, लेकिन यह विविधता हमें प्रगति, विशेषकर महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करने की कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए।”
— जवाहरलाल नेहरू
(हिंदू कोड बिल पर बहस – 1951)

“मेरा मानना है कि व्यक्तिगत कानून में धर्म को अलग कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि व्यक्तिगत कानून लोगों के बीच लिंग (gender) के आधार पर भेदभाव करते हैं, जिसकी अनुमति संविधान नहीं देता है।”
— डॉ. बी. आर. आंबेडकर
(संविधान सभा की बहस – 23 नवंबर 1948)

“यदि हम संपूर्ण देश के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते हैं, तो हमें जल्दबाजी के बजाय एक ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहां सभी समुदाय इसे स्वेच्छा से स्वीकार करें। जबरन थोपा गया कोई भी सामाजिक सुधार स्थायी नहीं हो सकता।”
— डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
(हिंदू कोड बिल और वैधानिक सुधारों पर विमर्श – 1951)

“संविधान के अनुच्छेद 44 का उद्देश्य पवित्र है। यदि हम एक राष्ट्र के रूप में उभरना चाहते हैं, तो नागरिक अधिकारों के मामलों में सांप्रदायिक आधार पर विखंडन को समाप्त करना ही होगा। एक संप्रभु राष्ट्र में दो समानांतर विधिक धाराएं नहीं चल सकतीं।”
— डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
(संसद में व्यक्तिगत कानून पर बहस – 1953)

● भूमिका

भारत केवल एक राजनीतिक इकाई या भू-भाग नहीं, अपितु विविधताओं से आपूरित एक जीवंत सभ्यतागत चेतना है। यहाँ अनेक संप्रदाय, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और लोक-परंपराएँ सदियों से सह-अस्तित्व के सिद्धांत के साथ पल्लवित हुई हैं। ऐसे बहुलतावादी समाज में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) का प्रश्न मात्र वैधानिक संहिताबद्धता (Codification) का विषय नहीं है; वरन यह हमारे संवैधानिक दर्शन, सामाजिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्र-निर्माण की समेकित प्रक्रियाओं से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक विमर्श है।

हाल के वर्षों में “उत्तराखंड समान नागरिक संहिता, 2024” और “असम UCC विधेयक, 2026” की विधायी पहलों ने इस सुसुप्त विमर्श को पुनः राष्ट्रीय परिदृश्य के केंद्र में ला खड़ा किया है। समर्थकों के दृष्टिकोण में यह कदम लैंगिक समरसता (Gender Parity) और समतामूलक नागरिक अधिकारों की दिशा में एक युगांतरकारी प्रस्थान है, जबकि आलोचकों की दृष्टि में यह भारत की सांस्कृतिक विविधता और अंतःकरण की स्वतंत्रता के ताने-बाने के समक्ष एक वैधानिक चुनौती प्रस्तुत कर सकता है। अतः यक्ष प्रश्न यह नहीं है कि सुधार अपरिहार्य हैं या नहीं, बल्कि विमर्श का मुख्य बिंदु यह है कि इस सामाजिक-कानूनी रूपांतरण (Socio-Legal Transformation) का मार्ग और उसकी प्रकृति क्या होनी चाहिए।

● UCC : वैधानिक पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक वैचारिक द्वंद्व

इस विमर्श को आगे बढाने के पहले, इसके विधिक पक्ष और इस संदर्भ में विद्यमान ऐतिहासिक वैचारिक द्वंद्व पर चर्चा प्रासंगिक हो जाता है।
भारतीय संविधान के भाग – 4 के अंतर्गत “अनुच्छेद 44” राज्य को संपूर्ण भारत में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) सुनिश्चित करने का नीति-निदेशक अधिदेश देता है। यद्यपि यह प्रावधान वैधानिक रूप से न्यायलय द्वारा अपरिवर्तनीय है, किंतु राष्ट्र-निर्माण के मूल दर्शन में यह सर्वोपरि स्थान रखता है। इसी संवैधानिक बिंदु पर भारत की स्वतंत्रता के समय से ही एक प्रखर ऐतिहासिक वैचारिक द्वंद्व दृष्टव्य रहा है।
इस विमर्श को मुख्य रूप से दो वैचारिक धाराओं के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है :

    1. परिवर्तनवादी/सुधारवादी पक्ष :
      इस धारा के अगुआ डॉ. बी. आर. आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू थे। डॉ. आंबेडकर का विधिक तर्क था कि व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) मूलतः लिंग आधारित विभेद को बढ़ावा देते हैं, जो अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) के प्रतिकूल है। इस विचारधारा की मान्यता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में नागरिक पहचान, धार्मिक पहचान से ऊपर होनी चाहिए। इसी क्रम में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय एकीकरण और संप्रभुता के लिए समानांतर विधिक धाराओं की समाप्ति को अपरिहार्य माना।

    1. क्रमिक/सतर्कतावादी पक्ष :
      इसके विपरीत, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों की मान्यता थी कि व्यक्तिगत कानून सांस्कृतिक अस्मिता और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28) के अभिन्न अंग हैं। उनका विचार था कि किसी भी सामाजिक सुधार को थोपने के बजाय ‘आम सहमति’ और ‘स्वैच्छिक स्वीकार्यता’ का वातावरण निर्मित किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक समरसता अक्षुण्ण रहे।

      अंततः, यह द्वंद्व केवल कानूनों के समरूपीकरण का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक बहुलतावाद और लैंगिक न्याय के मध्य एक सूक्ष्म, न्यायसंगत संतुलन स्थापित करने की मांग करता है।

ऐसे परिदृश्य में, उत्तराखंड और असम के विधायी प्रयोगों ने UCC को इस अमूर्त संवैधानिक आदर्श की परिधि से बाहर निकालकर एक व्यावहारिक नीतिगत वास्तविकता (Policy Reality) के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया है।

● UCC : पक्ष या वैचारिक आधार

समान नागरिक संहिता के संदर्भ में उपरोक्त विधिक एवं वैचारिक पक्षों के विश्लेषण के उपरांत इसके समर्थकों के विचारों का परीक्षण भी आवश्यक प्रतीत होता हैं। इस संदर्भ में उनका तर्क है कि :

    1. ऐतिहासिक रूप से, अधिकांश व्यक्तिगत कानूनों का झुकाव पुरुष-प्रधान संरचनाओं की ओर रहा है, जिसके कारण महिलाओं को उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, विवाह-विच्छेद और भरण-पोषण के मामलों में विसंगतियों और वंचना का सामना करना पड़ा है। डॉ. आंबेडकर के विधिक दर्शन के अनुरूप, एक सर्वसमावेशी नागरिक संहिता महिलाओं को पितृसत्तात्मक विसंगतियों से मुक्त कर संपत्ति में समान सहदायिकी (Coparcenary Rights) प्रदान करेगी, विवाह और विवाह-विच्छेद से जुड़ी विभेदकारी प्रक्रियाओं का उन्मूलन करेगी तथा पीड़ित महिलाओं के विधिक संरक्षण को संस्थागत सुदृढ़ता प्रदान करेगी। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग आधारित भेदभाव का निषेध) के आदर्शों को अक्षरशः धरातल पर उतारेगी।

    1. भारतीय पंथनिरपेक्षता ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘सर्वधर्म समत्व’ के सिद्धांतों पर आधारित है। जैसा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तर्क दिया था, नागरिक और सिविल मामलों में एक समान विधिक व्यवस्था लागू होने से नागरिकों की प्राथमिक पहचान किसी विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय से न होकर “एक राष्ट्र, एक नागरिक” की साझा संप्रभु पहचान से सुनिश्चित होगी। यह व्यवस्था विखंडनकारी प्रवृत्तियों को हतोत्साहित कर राष्ट्रीय एकीकरण को बल देगी।

    1. विभिन्न समुदायों के जटिल, अलिखित और विरोधाभासी व्यक्तिगत कानूनों के कारण भारतीय न्यायपालिका पर वादों का अत्यधिक बोझ (Pendency of Cases) रहता है। एक एकीकृत नागरिक संहिता विधिक प्रणाली का सरलीकरण (Simplification of Legal System) करेगी, न्यायिक निर्णयों में एकरूपता और निश्चितता लाएगी, प्रशासनिक विसंगतियों और जटिलताओं को न्यूनतम करेगी तथा न्याय की सुलभता (Access to Justice) को संवर्धित करेगी।

    1. समकालीन समाज तीव्र गति से परिवर्तनशील है। लिव-इन रिलेशनशिप (सह-जीवन), एकल अभिभावकत्व (Single Parenting) और समलैंगिक अधिकारों जैसे नवीन सामाजिक प्रतिमान उभर रहे हैं। उत्तराखंड और असम की संहिताओं में इन आधुनिक संबंधों को विनियमित और सुरक्षित करने का प्रयास किया गया है, ताकि इनमें शामिल पक्षों – विशेषकर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की जा सके।

● UCC : अंतर्निहित चुनौतियाँ एवं विधिक चिंताएँ

समान नागरिक संहिता के समर्थकों के उपरोक्त विचार एक आदर्श को परिलक्षित करते हैं परन्तु इस आदर्श की प्राप्ति एक जटिल कार्य है। इसके क्रियान्वयन के समक्ष न केवल कई चुनौतियाँ हैं बल्कि इसके आलोचक द्वारा व्यक्त कई आशंकाएं भी हैं, जैसे –

    1. आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानून केवल नागरिक नियम नहीं हैं, बल्कि वे धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक अस्मिता के अभिन्न अंग हैं। राज्य द्वारा इसमें अत्यधिक हस्तक्षेप संविधान के “अनुच्छेद 25 से 28” के तहत प्रदत्त ‘अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता’ के अधिकार को संकुचित कर सकता है।

    1. उत्तराखंड और असम के कानूनों में ‘लिव-इन संबंधों’ के अनिवार्य पंजीकरण और ऐसा न करने पर दंडात्मक प्रावधानों ने एक गंभीर विधिक बहस को जन्म दिया है। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, वयस्कों के व्यक्तिगत संबंधों की ऐसी कड़ाई से निगरानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा “के. एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ” मामले में घोषित “निजता के अधिकार (Right to Privacy – अनुच्छेद 21)” के प्रतिकूल प्रतीत होती है।

    1. पूर्वोत्तर की जनसांख्यिकी और उत्तराखंड की भौगोलिक विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए, दोनों राज्यों ने “अनुसूचित जनजातियों (ST)” को इस संहिता के दायरे से बाहर रखा है। यह निर्णय संविधान की “पाँचवीं और छठी अनुसूची” के तहत जनजातीय संस्कृति और उनकी प्रथागत प्रणालियों (Customary Laws) को दिए गए संरक्षण के सर्वथा अनुकूल है।

  परंतु, यहाँ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा व्यक्त की गई आशंका के आलोक में एक अकादमिक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है :
“यदि संहिता के अनुप्रयोग में ही अपवाद और बहिष्करण (Exclusion) विद्यमान हैं, तो क्या वह अपने मूल स्वरूप में ‘समान’ या ‘सार्वभौमिक’ नागरिक संहिता कहलाने की पात्रता रखती है ?”

    1. किसी भी प्रगतिशील कानून की प्रभावशीलता केवल उसके विधायी प्रारूप पर नहीं, बल्कि समाज द्वारा उसकी स्वीकार्यता (Social Acceptance) पर निर्भर करती है। उचित परामर्श और आम सहमति के बिना थोपे गये कानून सामाजिक ध्रुवीकरण और असंतोष को जन्म दे सकते हैं।

● UCC : अमेरिकी माॅडल एवं यूरोपीय मॉडल से भारत क्या सीख सकता है ?

वर्तमान भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने के संदर्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका एवं यूरोप की कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था (American Jurisprudence) से महत्वपूर्ण सबक सीखे जा सकते हैं।

● UCC : अमेरिकी माॅडल

अमेरिका में नागरिक कानूनों के संदर्भ में “अनेकता में एकता” (E Pluribus Unum) का एक विशिष्ट मॉडल अपनाया गया है जिनको निम्न बिंदुओं के अंतर्गत देखा जा सकता है :

  1. विधिक बहुलतावाद बनाम संघीय समरूपता (Federalism and Legal Pluralism)  :   अमेरिका में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे पारिवारिक कानून संघीय (Federal) स्तर पर एक समान नहीं हैं, बल्कि वे राज्यों के अधिकार क्षेत्र (State Jurisdiction) में आते हैं। इसके बावजूद, अमेरिका का ‘फुल फेथ एंड क्रेडिट क्लॉज’ (Full Faith and Credit Clause – Article IV) यह सुनिश्चित करता है कि एक राज्य द्वारा दिया गया विधिक प्रमाण पत्र दूसरे राज्य में भी मान्य हो।भारत उत्तराखंड और असम के प्रयोगों से यह सीख सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक कठोर, केंद्रीकृत संहिता थोपने के बजाय “प्रादेशिक प्रयोगों” को फलने-फूलने दिया जाए, जो स्थानीय संस्कृतियों का सम्मान करते हों।

  1. धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता का अमेरिकी मॉडल (Wall of Separation)  :   अमेरिकी संविधान का प्रथम संशोधन (First Amendment) राज्य और धर्म के बीच एक स्पष्ट दीवार खींचता है। अमेरिकी न्यायालयों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि राज्य नागरिकों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा जब तक कि कोई प्रथा बुनियादी मानवाधिकारों या सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) का उल्लंघन न करती हो।

    • संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में मॉर्मन का उदाहरण

मॉर्मन आंदोलन की स्थापना 1830 के दशक में जोसेफ स्मिथ द्वारा की गई थी। अन्य बातों के अलावा, माॅर्मन समुदाय के लोग बहुविवाह (polygamy) में विश्वास करते थे और मॉर्मन नेताओं की यह शिक्षा थी कि एक पुरुष का कई पत्नियाँ रखना उसका धार्मिक कर्तव्य है। ब्रिघम यंग के नेतृत्व में, यह समुदाय 1847 में पश्चिम की ओर प्रवास कर ‘सॉल्ट लेक वैली’ में बस गया, जो उस समय अमेरिकी अधिकारियों की पहुँच से बाहर था। जब मॉर्मन यूटा (Utah) में बसे, तब वह क्षेत्र मेक्सिको का हिस्सा था। मेक्सिको-अमेरिकी युद्ध और ‘गुआडालुपे हिडालगो की संधि’ (Treaty of Guadalupe Hidalgo) के बाद, यह क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का हिस्सा बन गया। जब अमेरिकी सरकार ने मॉर्मन समुदाय के बीच बहुविवाह को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया, तो माॅर्मन ने यह तर्क दिया कि :

• बहुविवाह उनके धर्म का एक हिस्सा था।
• अमेरिकी संविधान का पहला संशोधन (First Amendment) धर्म के स्वतंत्र पालन (free exercise of religion) की रक्षा करता है।
• इसलिए, संघीय सरकार को इस प्रथा को प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए।
यह वास्तव में एक ऐसा दावा था जिसके तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा एक विशिष्ट धार्मिक पारिवारिक कानून (Religious Family Law) तक बढ़ा दिया गया था।

    • अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

“रेनॉल्ड्स बनाम यूनाइटेड स्टेट्स” (Reynolds v. United States) के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मॉर्मन समुदाय के इस तर्क को खारिज कर दिया।
अदालत ने निम्नलिखित के बीच एक अंतर स्पष्ट किया :

    • विश्वास की स्वतंत्रता (Freedom of Belief) : जो पूरी तरह से संरक्षित है (एक व्यक्ति किसी भी चीज़ पर विश्वास कर सकता है)।

    • कर्म की स्वतंत्रता (Freedom of Action) : जो कानून के दायरे में आती है।

      धार्मिक मान्यताएँ वैध कानून द्वारा प्रतिबंधित आचरण या व्यवहार को उचित नहीं ठहरा सकतीं। सर्वोच्च अदालत ने प्रसिद्ध रूप से कहा कि यदि कानून से ऐसी धार्मिक छूट दी जाने लगी, तो हर नागरिक “अपने आप में एक कानून” (a law unto himself) बन जाएगा।

उपरोक्त अमेरिकी संदर्भ से भारत को भी यह सीखना होगा कि UCC का उद्देश्य धार्मिक प्रथाओं का समरूपीकरण (Uniformity of Rituals) नहीं, बल्कि केवल अधिकारों की समानता (Equality of Rights) होना चाहिए। अमेरिका की तरह, यहाँ भी नागरिक विवाह (Civil Marriage) को एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में इतना सुदृढ़ किया जा सकता है कि व्यक्तिगत कानून स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाएं।

● UCC : यूरोपीय माॅडल

यूरोप में, फ्रांस ने धर्मनिरपेक्षता (secularism) और धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों को त्यागने का मार्ग प्रशस्त किया। फ्रांसीसी क्रांति और ‘नेपोलियन कोड’ (Napoleonic Code) की विरासत ने निम्नलिखित व्यवस्थाएँ स्थापित कीं :

    • दीवानी विवाह (Civil marriage)

    • दीवानी तलाक (Civil divorce)

    • समान उत्तराधिकार नियम (Uniform inheritance rules)

फ्रांस की इस व्यवस्था के अन्तर्गत धार्मिक विवाहों का कोई स्वतंत्र कानूनी प्रभाव नहीं होता है। कानूनी मान्यता के लिए किसी भी जोड़े को दीवानी कानून (civil law) के तहत विवाह करना अनिवार्य है।
बाद में सभी यूरोपीय देशों ने इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया। यहाँ तक कि इटली और स्पेन जैसे देश, जहाँ ऐतिहासिक रूप से कैथोलिक धर्म का बहुत मजबूत प्रभाव रहा है, वहाँ भी आज विवाह, तलाक और उत्तराधिकार मुख्य रूप से दीवानी कानून द्वारा ही संचालित होते हैं। धार्मिक समारोहों को केवल राज्य के कानून द्वारा स्थापित ढांचे के भीतर ही मान्यता दी जाती है।

उपरोक्त यूरोपीय अनुभव हमें यह सीख देता है कि एक “समान नागरिक संहिता (uniform civil code)” और “मजबूत धार्मिक स्वतंत्रता” एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं। अधिकांश यूरोपीय देश सभी नागरिकों पर लागू होने वाली एक एकल धर्मनिरपेक्ष पारिवारिक-कानून प्रणाली (secular family-law system) को बनाए रखते हुए विश्वास, पूजा, संगठन और धार्मिक प्रथाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
आज वैश्विक स्तर पर समान नागरिक संहिता को धार्मिक स्वतंत्रता के असंगत (विपरीत) नहीं माना जाता है। बल्कि, इसे धर्मनिरपेक्षता का ही एक हिस्सा माना जाता है।

● UCC : क्या कहता है सर्वोच्च न्यायालय ?

भारत में समान नागरिक संहिता के संदर्भ में आगे की राह तय करने के पहले, UCC के अमेरिकी एवं यूरोपीय मॉडल के विश्लेषण के साथ-साथ, इसपर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा समय-समय पर दिये गये निर्णयों की चर्चा भी प्रासंगिक हो जाता है।

भारत में समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44) को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख सदैव सुधारवादी, मार्गदर्शक और लैंगिक न्याय का पक्षधर रहा है। न्यायालय ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से कार्यपालिका और विधायिका को इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है।

“मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985)” मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 44 केवल एक मृत अक्षर (Dead Letter) बनकर नहीं रह सकता। कोर्ट ने कहा कि एक समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकीकरण का मार्ग प्रशस्त करेगी और परस्पर विरोधी व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्विरोधों को समाप्त करेगी।

“सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995)” मामले में कोर्ट ने इसे पुनः रेखांकित करते हुए कहा कि जब तक UCC लागू नहीं होता, तब तक व्यक्तिगत कानूनों का दुरुपयोग (जैसे, विवाह विच्छेद किए बिना धर्म परिवर्तन करके दूसरा विवाह करना) विधिक विसंगतियां पैदा करता रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अनुच्छेद 44 के क्रियान्वयन हेतु उठाए गए कदमों की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया था।

“सायरा बानो बनाम भारत संघ (2017)” मामले में ‘तीन तलाक’ को असंवैधानिक घोषित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह स्थापित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के अधिकार के नाम पर महिलाओं के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14 और 21) का हनन नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उपरोक्त विश्लेषण यह दर्शाता है कि न्यायालय UCC को किसी धार्मिक पहचान को समाप्त करने के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि “लैंगिक समता” और “मानवीय गरिमा” सुनिश्चित करने के एक अनिवार्य माध्यम के रूप में देखती है। न्यायालय का विधिक दर्शन स्पष्ट करता है कि एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य में नागरिक अधिकार कभी भी रूढ़िवादी व्यक्तिगत संहिताओं के अधीन नहीं हो सकते।

● UCC : भावी पथ (The Way Forward)

उपरोक्त समग्र विमर्श के उपरांत हम पाते हैं कि, समान नागरिक संहिता के संवेदनशील प्रश्न को केवल “राजनीतिक ध्रुवीकरण” या “तुष्टिकरण बनाम बहुसंख्यकवाद” के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके समाधान हेतु अमेरिका एवं यूरोप के माॅडल से सीख लेते हुए एक मध्यम मार्ग अपनाने की आवश्यकता है, जैसे :

    1. क्रमिक विधिक सुधार (Incremental Reforms)

      नेहरू जी और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के संतुलित दृष्टिकोण के अनुसार, एकमुश्त संपूर्ण संहिता थोपने के बजाय, विधि आयोग (Law Commission) की अनुशंसाओं के अनुरूप सभी व्यक्तिगत कानूनों के भीतर मौजूद विभेदकारी प्रथाओं को पहले आंतरिक रूप से संशोधित किया जाना चाहिए।

    1. सार्थक विमर्श और सहभागिता

      सरकार को सभी हितधारकों—धार्मिक नेतृत्व, महिला संगठनों, जनजातीय परिषदों और नागरिक समाज—के साथ एक पारदर्शी, संवेदी और गैर-राजनीतिक विमर्श (Deliberative Consensus) स्थापित करना चाहिए।

    1. विविधता और समरूपता में संतुलन

      भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान उसकी संप्रभू शक्ति है। इसलिए सुधारों का ध्येय “सांस्कृतिक समरूपता (Cultural Uniformity) लाना नहीं बल्कि ‘अधिकारों की समानता’ (Equality of Rights) सुनिश्चित करना होना चाहिए।

● निष्कर्ष

अंत में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि, समान नागरिक संहिता का विमर्श आधुनिक भारत के सबसे जटिल संवैधानिक और सामाजिक द्वंद्वों में से एक है। यह स्वतंत्रता, समता, पंथनिरपेक्षता, निजता और सांस्कृतिक बहुलतावाद जैसे परस्पर-विरोधी प्रतीत होने वाले मूल्यों के मध्य एक सूक्ष्म और न्यायसंगत संतुलन (Delicate Balance) की मांग करता है।
UCC का अंतिम ध्येय केवल कानूनों का समरूपीकरण नहीं, बल्कि “मानवीय न्याय, विधिक गरिमा और समान अवसरों की संप्रभु स्थापना” होना चाहिए। भारत को एक ऐसे स्वदेशी मॉडल (Indigenous Model) को विकसित करना होगा जो संवैधानिक आधुनिकता (Constitutional Modernity) का संवाहक भी हो और इस महाद्वीप की सांस्कृतिक बहुलता (Cultural Pluralism) का संरक्षक भी। आखिरकार, एक कल्याणकारी राज्य में समान नागरिक संहिता वही है जो बहुसंख्यकवादी आधिपत्य का माध्यम न बनकर, ‘कमजोरों, वंचितों और महिलाओं के सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करे।’

“भारत की संवैधानिक यात्रा का अंतिम गंतव्य, विविधता का शमन करना नहीं, बल्कि विविधता के इस विराट कैनवास पर प्रत्येक नागरिक के लिए न्यायसंगत अधिकारों की अमिट लकीर खींचना है।”

Dr. S. S. Pandey 

Sociologist & UPSC Mentor

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